अस्सलामु अलेकुम, मेरे प्यारे दोस्तों और भाइयों-बहनों। आज हम बात करने वाले हैं एक ऐसी आदत की, जो सिर्फ हमारे दुनियावी ज़िन्दगी को ही नहीं, बल्कि हमारी रूह को भी ताज़गी और सुकून बख्शती है। यह आदत है "बांटने की आदत" लेकिन यह बंटवारा सिर्फ माल-दौलत तक महदूद नहीं, बल्कि हमारे हुनरों और ख़ूबियों तक वसी है। आइए, गौर से इस ज़रूरी मौज़ू पर थोड़ा तफ्फ़कुर सोच-विचार करें।
तफ़सील
हम अक्सर सोचते हैं कि बांटने का मतलब सिर्फ पैसा, कपड़े या खाना देना है। यह ज़रूर एक अज्र (सवाब) का काम है, मगर अल्लाह तआला ने हमें जो अक़्ल, तजुरबा, हुनर और वक़्त दिया है, उसे बांटना भी उतना ही अहम और सवाब वाला अमल है।
अपने माल के साथ साथ अपनी सलाहियतों को भी बांटा करें
यानी, अगर आप किसी मोज़ू के जानकार हैं, तो किसी को मुख़लिसाना (ईमानदारी से) मशविरा (सलाह) दें। अगर आपकी कोई खास स्किल है, जैसे लिखना, सिलाई करना, दवाखाना चलाना या किसी मुश्किल का हल निकालना, तो कभी-कभार किसी का मुफ़्त काम कर दें। यह "सदक़ा-ए-जारिया" (लगातार सवाब मिलने वाला) की तरह है।
किसी की कोई मुश्किल आसान कर दें, किसी का दुख बांट लें, और किसी की खुशी की वजह बन जाएं।
यहां दिल की गहराइयों से हमदर्दी ज़ाहिर की गई है। कभी-कभी सिर्फ किसी का बोझ हल्का करने के लिए हाथ बढ़ा देना, या उसके गम में शरीक हो जाना, या उसकी खुशी में ख़ुलूस दिल से शामिल होना – यह सब ऐसे अमल हैं जो दूसरे के चेहरे पर मुस्कान ला देते हैं। और यह मुस्कान सीधे आपके अपने दिल पर नूर (रोशनी) और इत्मीनान बरसा देती है।
फिर देखिए आप अपने आप को कितना पुर-सुकून महसूस करेंगे
यह इस आदत का सबसे बड़ा इनाम है। दुनिया की कोई भी दौलत, शोहरत या सुख उस रूहानी सुकून और इत्मीनान को नहीं खरीद सकती, जो दूसरों के लिए कुछ करने के बाद दिल को मिलती है। यह वह "सुकून और इत्मीनान है" जिसका ज़िक्र क़ुरान-ए-पाक में है। यह आदत इंसान को खुद गर्जी से बाहर निकालकर रूहानी सफ़र पर ले जाती है।
ख़ातिमा
तो आइए, आज से ही यह आदत अपनाने का पक्का इरादा करें। छोटी-छोटी शुरुआत करें। किसी को दुआ दें, किसी के लिए वक़्त निकालें, किसी की मदद को आगे बढ़ें। याद रखें, हमारे प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: "सबसे बेहतर इंसान वह है जो दूसरों को सबसे ज़्यादा फायदा पहुंचाए।
इस आदत से न सिर्फ आपकी दुनिया रौशन होगी, बल्कि आख़िरत के खाते में भी नेकियां जमा होती चली जाएंगी। अल्लाह हम सबको दूसरों के लिए खैर और भलाई का ज़रिया बनने की तौफीक अता फरमाए। आमीन।
