आज हम आपके साथ एक ऐसी हदीस शरीफ़ा शेयर करने जा रहे हैं जो हमें रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आसानी से अमल करके अपने नेकियों के खज़ाने को बढ़ाने का एक बेहतरीन तरीका बताती है। यह हदीस न सिर्फ़ हमारी दुआओं का दायरा बढ़ाती है, बल्कि हमारे दिलों में इख़्लास और भाईचारे के जज़्बात को भी जगाती है।
हदीस का अनमोल पैग़ाम
हुज़ूर नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:
"जो बंदा अल्लाह तआला से एहल-ए-ईमान (मोमिनीन और मोमिनात) की बख़्शिश की दुआ करता है, तो उस के नाम-ए-आमाल में हर मोमिन मर्द और औरत के नाम-ए-आमाल से एक-एक नेकी लिख दी जाती है।
(मजमा उल-जवाइद: 17598)
एक दुआ अनगिनत नेकियाँ
इस हदीस-ए-पाक का मतलब सीधा और साफ़ है। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हमें एक ऐसा आसान और मुफ़ीद अमल बता रहे हैं जिसमें न तो पैसे ख़र्च करने की ज़रूरत है, न ज़्यादा मेहनत की। बस दिल से एक दुआ:
"ऐ अल्लाह! सारे मोमिन मर्दों और औरतों को बख़्श दे। उनके गुनाह माफ़ फ़र्मा। उनपे रहम फ़र्मा।
इस छोटी सी दुआ का सवाब क्या है? हैरान कर देने वाला! आपके नेकी के खाते में दुनिया भर के हर मोमिन मर्द और औरत के बदले एक-एक नेकी जुड़ जाती है। सोचिए, दुनिया में करोड़ों मुसलमान हैं। एक बार यह दुआ करने से आप करोड़ों नेकियाँ कमा सकते हैं! यह अल्लाह का कितना बड़ा करम है कि उसने इतना आसान रास्ता हमारे लिए बना दिया।
अमल छोटा सवाब बड़ा
अक्सर हम सोचते हैं कि नेकी कमाने के लिए बड़े-बड़े काम करने पड़ते हैं। यह बात सही है, लेकिन नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमें यह भी सिखाया कि छोटे-छोटे अमल से भी बड़े-बड़े सवाब हासिल किए जा सकते हैं। यह दुआ भी उन्हीं में से एक है। क्या हम रोज़ सुबह-शाम, नमाज़ के बाद, या जब भी याद आए, यह छोटी सी दुआ नहीं कर सकते? ज़रूर कर सकते हैं।
इस दुआ का एक और पहलू यह है कि इससे हमारे दिल में दूसरे मुसलमान भाई-बहनों के लिए हमदर्दी और मुहब्बत पैदा होती है। हम सिर्फ़ अपने लिए ही नहीं, बल्कि पूरी उम्मत के लिए दुआ करने वाले बन जाते हैं। यही तो असल भाईचारा है।
कब और कैसे करें यह दुआ?
1. नमाज़ के बाद: हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद बैठे-बैठे सभी मोमिनीन और मोमिनात के लिए मगफ़िरत की दुआ करें।
2. सुबह-शाम की अज़कार: अपने रोज़ाना के वज़ीफ़ों में इसे शामिल कर लें।
3. जब भी याद आए: ऑफ़िस में ब्रेक के दौरान, सफ़र में, बिस्तर पर सोते वक्त... कभी भी, कहीं भी यह दुआ की जा सकती है।
4. ख़ास मौक़े: जुमे की नमाज़ के दिन, शब-ए-क़द्र, अशरा-ए-मुहर्रम, रमज़ान के पाक महीने में इस दुआ को ज़्यादा से ज़्यादा दोहराएँ।
दुआ का सही तरीका यह है कि दिल को पूरी तरह से लगाएँ और यह यक़ीन रखें कि अल्लाह हमारी दुआ क़बूल फ़र्माएगा और हमें इसका सवाब ज़रूर देगा।
आख़िरी बात
प्यारे भाइयो और बहनो, इस हदीस से हमें यह सीख मिलती है कि इस्लाम हमें एक दूसरे के लिए दुआ करने, एक-दूसरे से हमदर्दी रखने और इज्तेमाई तौर पर अल्लाह की रहमत के ज़रिए जुड़ने का पैग़ाम देता है। यह छोटा सा अमल हमारी आख़िरत को रौशन कर सकता है।
आइए, आज से ही इस सुनहरे अमल की शुरुआत करें। अपने लिए भी दुआ करें और सभी मोमिन भाई-बहनों के लिए भी दुआ करें। यक़ीन मानिए, इस दुआ का सवाब तो मिलेगा ही, साथ ही हमारा दिल भी नूरानी हो जाएगा।
अल्लाह हम सब को इस पवित्र हदीस पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़र्माए। आमीन।
