मोहतरम काराईन अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुहु मैं आज जो बात आप के सामने पेश करना चाहता हूँ वो कोई नई बात नहीं बल्कि वो हकीकत है जिस पर हमारा दीन बार-बार तवज्जुह दिलाता है। वो बात ये है कि जब तक हम अपने अंदर अपने किरदार अपने आमाल में सुधार नहीं लाएंगे उस वक़्त तक हम समाज मुआशरे और पूरी इंसानियत की इस्लाह की तवक्को नहीं कर सकते क्यूँकि फर्द ही मुआशरे की बुनियाद है। एक-एक ईंट से ही दीवार बनती है और अगर ईंटें ही कमजोर हों तो फिर दीवार कब तक टिकेगी?
दूसरों को बदलने से पहले खुद को बदलें
अल्लाह तआला फ़रमाता है إِنَّ اللّهَ لاَ يُغَيِّرُ مَا بِقَوْمٍ حَتَّىٰ يُغَيِّرُواْ مَا بِأَنفُسِهِمْ बेशक अल्लाह किसी क़ौम की हालत को नहीं बदलता यहाँ तक के वो लोग अपने आप में खुद तब्दीली पैदा कर डालें। (सूरह रअद: 11)
यानी अगर हम चाहते हैं कि हालात बदलें समाज सुधरे नाइंसाफ़ियाँ खत्म हों और एक अच्छा मुआशरा बने तो उसकी पहली सीढ़ी है खुद अपने आप को बदलना। जब तक हम अपनी नीयतें पाक नहीं करेंगे अपने आमाल को दुरुस्त नहीं करेंगे अपने रवैये में अदब लिहाज़ और अमानतदारी नहीं लाएँगे तब तक सिर्फ दूसरों को कोसने से कुछ हासिल नहीं होगा।
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया "तुम में से हर शख्स निगाहबान है और हर एक से उसके मा तहतों के बारे में सवाल किया जाएगा। (बुख़ारी व मुस्लिम)
अब आप सोचिए अगर एक बाप अपने बच्चों की अच्छी परवरिश नहीं करेगा एक उस्ताद अपने तलबा की सही रहनुमाई नहीं करेगा एक ताजिर अमानतदारी से काम नहीं करेगा और एक पड़ोसी अपने पड़ोसी का हक़ अदा नहीं करेगा तो फिर मुआशरे में सुधार और कैसे इस्लाह होगी?
समाज की बुराइयों का इलाज अपनी इस्लाह में है
मोहतरम भाइयो और बहनों हम आज समाज की बुराइयों पर बहुत बात करते हैं झूठ धोखा रिश्वत बेहयाई बेइंसाफी लेकिन क्या कभी हमने अपने दिल में झाँक कर देखा कि क्या हम खुद इन चीज़ों से पाक हैं?
कभी सोचा कि हम नमाज़ की पाबंदी करते हैं या नहीं?
क्या हम झूठ से परहेज़ करते हैं?
क्या हम अपने माँ-बाप बीवी-बच्चों और पड़ोसियों के साथ इंसाफ करते हैं?
क्या हमारे अंदर हया है इख़लास है अदब है?
अगर जवाब “नहीं” है तो फिर शिकायत करने का क्या हक़ बचता है?
हज़रत उमर की सीरत
इस्लामी तारीख़ में हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु का ज़िक्र आता है। रातों को उठ-उठ कर मदीना की गलियों में लोगों के हालात देखते भूकों को खाना खिलाते बीमारों की तीमारदारी करते थे हम भी अपने अन्दर यह सिफात पैदा करें लोगों का हाल चाल पूछें भूकों को खाना खिलाएं बीमारों की तीमारदारी करें तो इससे सवाब भी मिलेगा लोगों के दिलों में इज़्ज़त भी बढ़ेगी और समाज में सुधार भी आएगा।
हमारे बुज़ुर्ग कहा करते थे अपने अंदर का अंधेरा दूर करो तो बाहर रोशनी खुद-ब-खुद फैल जाएगी।
अगर हर शख्स ये ठान ले कि मैं झूठ नहीं बोलूँगा मैं दूसरों के हुक़ूक़ अदा करूँगा मैं नमाज़ का पाबंद रहूँगा मैं अपने बच्चों की अच्छी तालीम व तरबियत करूँगा तो यकीन कीजिए ये मुआशरा एक बाग़ बन जाएगा जिसमें हर तरफ अमन होगा मोहब्बत होगी और इस्लामी तहज़ीब की खुशबू होगी।
जब फर्द सुधरता है तो कौम संवरती है
इसी लिए हमें खुद को सँवारना है गुनाहों से बचें नेक अमल करें अल्लाह की बारगाह में तौबा करें कुरान की तिलावत करें कुरान पर अमल करें और सुन्नत को ज़िन्दगी का हिस्सा बनाएँ।
आख़िर में एक बात और अर्ज़ करूँगा समाज को बदलना है तो आइए अपने दिलों को बदलें अपनी नीयतों को पाक करें और अपने किरदार को इस्लामी बनाएँ यही तरीका है इस्लाह का यही तरीका है फर्द से मुआशरा बनाने का।
अल्लाह तआला हमें और हम सभी की इस्लाह करने की तौफ़ीक़ दे और हम सबको ऐसा मुआशरा बनाने वाला बनाए जो कुरआन और सुन्नत का आइना हो।
